Thursday, 12 April 2012

पूस की रात(मुंशी प्रेमचंद)

हल्कू ने आकर स्त्री से कहा-सहना आया है । लाओं, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे ।
मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली-तीन ही रुपये हैं,  दे दोगे तो कम्मल कहॉँ से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी ? उससे कह दो, फसल पर दे देंगें। अभी नहीं ।
हल्कू एक क्षण अनिशिचत दशा में खड़ा रहा । पूस सिर पर आ गया, कम्बल के बिना हार मे रात को वह किसी तरह सो नहीं सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियॉं देगा। बला से जाड़ों मे मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी । यह सोचता हुआ वह अपना भारी-भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिध्द करता था ) स्त्री के समीप आ गया और खुशामद करके बोला-दे दे, गला तो छूटे ।कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचँगा ।
मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और ऑंखें तरेरती हुई बोली-कर चुके दूसरा उपाय! जरा सुनूँ तो कौन-सा उपाय करोगे ? कोई खैरात दे देगा कम्मल ? न जान कितनी बाकी है, जों किसी तरह चुकने ही नहीं आती । मैं कहती हूं, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते ? मर-मर काम करों, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुटटी हुई । बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ   हैं । पेट के लिए मजूरी करों । ऐसी खेती से बाज आयें । मैं रुपयें न दूँगी, न दूँगी ।
हल्कू उदास होकर बोला-तो क्या गाली खाऊँ ?
मुन्नी ने तड़पकर कहा-गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है ?
मगर यह कहने के साथ् ही उसकी तनी हुई भौहें ढ़ीली पड़ गई । हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भॉँति उसे घूर रहा था ।
उसने जाकर आले पर से रुपये निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए। फिर बोली-तुम छोड़ दो अबकी से खेती । मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी । किसी की धौंस तो न रहेगी । अच्छी खेती है ! मजूरी करके लाओं, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस ।
हल्कू ने रुपयें लिये और इस तरह बाहर चला, मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हों । उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-काटकर तीन रुपये कम्बल के लिए जमा किए थें । वह आज निकले जा रहे थे । एक-एक पग के साथ उसका मस्तक पानी दीनता के भार से दबा जा रहा था ।


2
पूस की अँधेरी रात ! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बॉस के खटाले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा कॉप रहा था । खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था । दो मे से एक को भी नींद नहीं आ रही थी ।
हल्कू ने घुटनियों कों गरदन में चिपकाते हुए कहा-क्यों जबरा, जाड़ा लगता है ? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहॉँ क्या लेने आये थें ? अब खाओं ठंड, मै क्या करूँ ? जानते थें, मै। यहॉँ हलुआ-पूरी खाने आ रहा हूँ, दोड़े-दौड़े आगे-आगे चले आये । अब रोओ नानी के नाम को ।
जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और अपनी कूँ-कूँ को दीर्घ बनाता हुआ कहा-कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे । यीह रांड पछुआ न जाने कहाँ से बरफ लिए आ रही हैं । उठूँ, फिर एक चिलम भरूँ । किसी तरह रात तो कटे ! आठ चिलम तो पी चुका । यह खेती का मजा हैं ! और एक भगवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा आए तो गरमी से घबड़ाकर भागे। मोटे-मोटे गददे, लिहाफ, कम्बल । मजाल है, जाड़े का गुजर हो जाए । जकदीर की खूबी ! मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटें !
हल्कू उठा, गड्ढ़े मे से जरा-सी आग निकालकर चिलम भरी । जबरा भी उठ बैठा ।
हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा-पिएगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता हैं, हॉँ जरा, मन बदल जाता है।
जबरा ने उनके मुँह की ओर प्रेम से छलकता हुई ऑंखों से देखा ।
हल्कू-आज और जाड़ा खा ले । कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूँगा । उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा ।
जबरा ने अपने पंजो उसकी घुटनियों पर रख  दिए और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया । हल्कू को उसकी गर्म सॉस लगी ।
चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके लेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊँगा, पर एक ही क्षण में उसके हृदय में कम्पन होने लगा । कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भॉँति उसकी छाती को दबाए हुए था ।
जब किसी तर न रहा गया, उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसक सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया । कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद मे चिपटाए हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था । जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न ,थी । अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता । वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा को पहुंचा दिया । नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था ।
सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पाई । इस विशेष आत्मीयता ने उसमे एक नई स्फूर्ति पैदा कर रही थी, जो हवा के ठंडें झोकों को तुच्छ समझती थी । वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भूँकने लगा । हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर वह उसके पास न आया । हार मे चारों तरफ दौड़-दौड़कर भूँकता रहा। एक क्षण के लिए आ भी जाता, तो तुरंत ही फिर दौड़ता । कर्त्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति ही उछल रहा था ।


3
एक घंटा और गुजर गया। रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरु किया।
हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई, ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया हैं, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहीं है। उसने झुककर आकाश की ओर देखा, अभी कितनी रात बाकी है ! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े । ऊपर आ जाऍंगे तब कहीं सबेरा होगा । अभी पहर से ऊपर रात हैं ।
हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर आमों का एक बाग था । पतझड़ शुरु हो गई थी । बाग में पत्तियो को ढेर लगा हुआ था । हल्कू ने सोच, चलकर पत्तियों बटोरूँ और उन्हें जलाकर खूब तापूँ । रात को कोई मुझें पत्तियों बटारते देख तो समझे, कोई भूत है । कौन जाने, कोई जानवर ही छिपा बैठा हो, मगर अब तो बैठे नहीं रह जाता ।
उसने पास के अरहर के खेत मे जाकर कई पौधें उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिये बगीचे की तरफ चला । जबरा ने उसे आते देखा, पास आया और दुम हिलाने लगा ।
हल्कू ने कहा-अब तो नहीं रहा जाता जबरू । चलो बगीचे में पत्तियों बटोरकर तापें । टॉटे हो जाऍंगे, तो फिर आकर सोऍंगें । अभी तो बहुत रात है।
जबरा ने कूँ-कूँ करें सहमति प्रकट की और आगे बगीचे की ओर चला।
बगीचे में खूब अँधेरा छाया हुआ था और अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था । वृक्षों से ओस की बूँदे टप-टप नीचे टपक रही थीं ।
एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू लिए हुए आया ।
हल्कू ने कहा-कैसी अच्छी महक आई जबरू ! तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही हैं ?
जबरा को कहीं जमीन पर एक हडडी पड़ी मिल गई थी । उसे चिंचोड़ रहा था ।
हल्कू ने आग जमीन पर रख दी और पत्तियों बठारने लगा । जरा देर में पत्तियों का ढेर लग गया था । हाथ ठिठुरे जाते थें । नगें पांव गले जाते थें । और वह पत्तियों का पहाड़  खड़ा कर रहा था । इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा ।
थोड़ी देर में अलावा जल उठा । उसकी लौ ऊपर वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी । उस अस्थिर प्रकाश में बगीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थें, मानो उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर सँभाले हुए हों । अन्धकार के उस अनंत सागर मे यह प्रकाश एक नौका के समान  हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था ।
हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था । एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पॉवं फैला दिए, मानों ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में आए सो कर । ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था ।
उसने जबरा से कहा-क्यों जब्बर, अब ठंड नहीं लग रही है ?
जब्बर ने कूँ-कूँ करके मानो कहा-अब क्या ठंड लगती ही रहेगी ?
‘पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठंड क्यों खातें ।’
जब्बर ने पूँछ हिलायी ।
अच्छा आओ, इस अलाव को कूदकर पार करें । देखें, कौन निकल जाता है। अगर जल गए बचा, तो मैं दवा न करूँगा ।
जब्बर ने उस अग्नि-राशि की ओर कातर नेत्रों से देखा !
मुन्नी से कल न कह देना, नहीं लड़ाई करेगी ।
यह कहता हुआ वह उछला और उस अलाव के ऊपर से साफ निकल गया । पैरों में जरा लपट लगी, पर वह कोई बात न थी । जबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ ।
हल्कू ने कहा-चलो-चलों इसकी सही नहीं ! ऊपर से कूदकर आओ । वह फिर कूदा और अलाव के इस पार आ गया ।
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पत्तियॉँ जल चुकी थीं । बगीचे में फिर अँधेरा छा गया था । राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाकी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर जरा जाग उठती थी, पर एक क्षण में फिर ऑंखे बन्द कर लेती थी !
हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा । उसके बदन में गर्मी आ गई थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाए लेता था ।
जबरा जोर से भूँककर खेत की ओर भागा । हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुण्ड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुण्ड था । उनके कूदने-दौड़ने की आवाजें साफ कान में आ रही थी । फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं है। उनके चबाने की आवाज चर-चर सुनाई देने लगी।
उसने दिल में कहा-नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। नोच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहॉँ! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोखा हुआ!
उसने जोर से आवाज लगायी-जबरा, जबरा।
जबरा भूँकता रहा। उसके पास न आया।
फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था। कैसा दँदाया हुआ बैठा था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला।
उसने जोर से आवाज लगायी-हिलो! हिलो! हिलो!
जबरा फिर भूँक उठा । जानवर खेत चर रहे थें । फसल तैयार हैं । कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किए डालते है।
हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन कदम चला, पर एकाएक हवा कस ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक का-सा झोंका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा ।
जबरा अपना गला फाड़ डालता था, नील गाये खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था । अकर्मण्यता ने रस्सियों की भॉति उसे चारों तरफ से जकड़ रखा था।
उसी राख के पस गर्म जमीन परद वही चादर ओढ़ कर सो गया ।
सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैली गई थी और मुन्नी की रही थी-क्या आज सोते ही रहोगें ? तुम यहॉ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया ।
हल्कू न उठकर कहा-क्या तू खेत से होकर आ रही है ?
मुन्नी बोली-हॉँ, सारे खेत कासत्यनाश हो गया । भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहॉ मँड़ैया डालने से क्या हुआ ?
हल्कू ने बहाना किया-मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी हैं। पेट में ऐसा दरद हुआ, ऐसा दरद हुआ कि मै नहीं जानता हूँ !
दोनों फिर खेत के डॉँड पर आयें । देखा सारा खेत रौदां पड़ा हुआ है और जबरा मॅड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों ।
दोनों खेत की दशा देख रहे थें । मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था ।
मुन्नी ने चिंतित होकर कहा-अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।
हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा-रात को ठंड में यहॉ सोना तो न पड़ेगा।

Wednesday, 11 April 2012

अधूरी दास्ताँ


अधूरी है ये जिंदगी
अधूरी है हर दास्ताँ
अधूरी है ये साँसों की डोरी
क्योंकि खिचे इसे कोई अपनी ओर

हमारी जिंदगी में हमे लाखो लोग मिलते हैं कुछ ज्यादा अच्छे होते हैं तो कुछ कम। लेकिन हमारे जीवन में प्रत्येक दिन कितने ही ऐसे लोग ऐसे मिलते हैं जिन्हें हम चाह कर भी नहीं भुला सकते हैं। वो लोग होते ही कुछ ऐसे हैं उनक व्यवहार उनकी बातें हर चीज़ उनकी एक याद बनकर रह जाती और वो लोग हमे छोड़ कर चले जाते हैं । क्योंकि ये जिंदगी एक समय का पहिया है जिसमे दिन ढलते हैं, और हर इन्सान को इसके साथ चलना पड़ता है । और वो इसी की वजह से आगे निकल जाते हैं। पर वो हमारी जिन्दगी  में एक छाप छोड़ जाते हैं।वो लोग अक्सर हमे  ऐसी राहों में मिलते हैं जो राहें हमारे लिए अनजानी होती हैं ।तो फिर उन राहो के राही भी हमारे लिए अनजाने बन कर रह जाते हैं । उनकी एक मुलाकात ऐसी होती है की हमारा दिल तो चाहता है की वो हमारे हमसफ़र बन जाये । लेकिन जिन्दगी का सफ़र बहुत लम्बा है। कोई कंही रह जाता है तो कोई कंही । वो लोग हमे  ढूँढने से भी दुबारा नहीं मिलते । पर फिर भी हम उनसे मिलाना चाहते हैं। हम उनको याद करते हैं लेकिन वोम हमेशा के लिए खो जाते हैं। जो हमे दोबारा कभी नहीं मिलते हैं। क्योंकि वो ओनी मंजिल की ओर निकल जाते हैं। और हम अपनी मंजिल की ओर । इस तरह फिर भिचाद जाते हैं दो राही अनजानी राहों में । और बनती है एक और अधूरी दास्ताँ
आपने सुना भी  होगा................


अक्सर इस दुनिया में अनजाने मिलते हैं
अनजानी राहों में  मिलके खो जाते हैं 
लेकिन हमेशा वो याद आते हैं।
स्वरचित (neha singh 11-april2012)

 

Tuesday, 10 April 2012

heartless man



Doctors from the Texas Heart Institute have successfully replaced a patient’s heart with a device that keeps the blood flowing, thereby allowing him to live without a detectable heartbeat or even a pulse. Here’s how it works:

The turbine-like device, that are simple whirling rotors, developed by the doctors does not beat like a heart, rather provides a ‘continuous flow’ like a garden hose.

Craig Lewis was a 55-year-old, dying from amyloidosis, which causes a build-up of abnormal proteins. The proteins clog the organs so much that they stop working, according to NPR.

But after the operation, with the ‘machine’ as his heart’s replacement, Lewis’ blood continued to spin and move through his body.

However, when doctors put a stethoscope to his chest, no heartbeat or pulse can be heard (only a ‘humming’ sound)—which “by all criteria that we conventionally use to analyze patients”, Doctor Cohn said, he is dead.

This is proof that “human physiology can be supported without a pulse”.

With all the talk of replacing human organs with those of an animal and electronic hearts, it’s surprising that medical researchers overlooked taking a trip to the plumbing section of the hardware store for replacement parts!.

Natural Beauty

सुन्दरता ये शब्द तो सब लोग जानते ही होंगे पर क्या कोई ये जनता है की ये सुन्दरता क्या  होती है।
लोग कहते है इन्सान की सूरत नहीं मन सुन्दर होता है लेकिन कुछ लोगो की सुन्दरता मन और तन दोनों ही रूपों मैं होती हैं। या ये कहें की वो कुदरती ही सुन्दर होते हैं मैं आपको यंहा एक बेहद ही खुबसूरत शक्सियत से रूबरू करवाने जा रही हूँ । यूँ तो वो अब इस दुनिया मैं नहीं रही हैं लेकिन उनके चाहने वालों की आज भी दुनिया  में कोई कमी नहीं हैं । उनकी अदाओं के जलवे पूरे संसार में बिखरे हैं। उनकी  जीतनी तारीफ़ की जाये उतनी कम है । हम किसी भी शख्स से पूछ लें अगर वो इंसान वाकई में ये जानता है की खूबसूरती क्या होती है वो इनको देखकर माशा अल्लाह कहे बिना शायद ही रह पाए। और वाकई में ये खूबसूरती वो है जिसे हम शायद ही कभी भूल पाएंगे।अब आप सोच रहे होंगे की वो शख्स कौन है वो शक्सियत है बॉलीवुड की विश्व प्रसिद्ध अदाकारा कहने को तो काफी खुसुरत हैं लेकिन उनकी जिंदगी उतनी ही दर्द भरी है

.............................................मधुबाला जी ....................

तो चलिए एक नजर डालते हैं इस हसीं अदाकारा की जीवन के  कुछ पलों पर की कैसे वो इस मुकाम तक पंहुच पायी।
तो थाम लीजिये अपने दिलो को कंही ये इस हसीं के पास न चला जाये 
 भारतीय सिने पटल की अप्रतिम सौंदर्य की मल्लिका मधुबाला को गुजरे कई दशक बीत चुके हैं। इसके बावजूद अपने सौंदर्य और अपने अभिनय की बदौलत वह आज तक भारतीय सिनेमा की आइकन बनी हुर्ह हैं।  मधुबाला के समय की तुलना में आज का समाज बहुत बदल गया है लेकिन आज भी मधुबाला की तरह बनना और दिखना ज्यादातर लड़कियों का सपना रहता है। अत्यंत निर्धन परिवार में जन्मी और पली-बढ़ी मधुबाला ने लोकप्रियता का जो शिखर हासिल किया वह विलक्षण प्रतीत होता है। लेकिन इतना होने के बावजूद भी मधुबाला के जीवन के ज्यादातर पहलुओं से लोग अनजान हैं। 
मुमताज जंहा बेगम देहलवी ये है इनका पूरा नाम इनका जन्म 14 february  1933 को हुआ था। 
मधुबाला की कहानी गर्दिश से उठकर सितारों तक पहुंचने की कहानी मात्रा नहीं है बल्कि कठोर जीवन संघर्ष की एक मुकम्मल गाथा है जिसे पढ़ने पर पता चलता है कि जो कामयाबी और शोहरत दूर से अत्यंत सुहानी लगती है उसे पाने के लिए कितना कुछ खोना और सहना पड़ता है। मधुबाला की कहानी को पूरे ब्यौरे के साथ जानना इसलिए जरूरी है ताकि यह समझा जा सके कि कामयाबी का सफर जितना सुखद दिखता है दरअसल वह उतना सुखद नहीं होता बल्कि अक्सर उसे कांटे भरे रास्तों पर चल कर पूरा करना होता है।
मधुबाला का जीवन बहुत छोटा रहा। महज 36 साल की जिस उम्र में उन्होंने मौत को गले लगाया उस उम्र में लोग अपने करियर की कायदे से शुरूआत करते हैं लेकिन उन्होंने इस उम्र में ही सबकुछ पा लिया - बेपनाह शोहरत और समृद्धि। लेकिन इसके बाद भी उन्हें वे चीजें नहीं मिलीं जिनके लिए वह जीवन भर तड़पती रहीं। मधुबाला की कहानी जीवन के इस कड़वे सच को समझने के लिए भी जरूरी है। मधुबाला की कहानी एक और तरह से भी महत्वपूर्ण है। बाल कलाकार के रूप में जब मधुबाला का पदार्पण हुआ और 1942 में फिल्म बसंत में जब वह एक छोटी सी भूमिका में अवतरित हुईं तब भारतीय सिनेमा विकास के आरंभिक चरण में था और जब 1971 में उनकी अंतिम फिल्म ज्वाला रिलीज हुई तब भारतीय सिनेमा का स्वर्ण काल उतार पर था।
 
Childhood and Early Life
Madhubala was born as ‘Mumtaz Begum Jehan Dehlavi’ on 14th February 1933, in Delhi, India. She was born into an ethnic Pathan family and was the fifth amongst the eleven children of Ataullah Khan. Within a few years of her birth, her father lost his job at the Imperial Tobacco Company. Following this, the family had to face many hardships, even the death of four of her sisters and her two brothers. This left the family with Madhubala and her four sisters as the only children. In order to gain employment, Ataullah Khan relocated to Bombay. Madhubala entered the film industry when she was hardly nine years old.
Child Artist
MadhubalaMadhubala bagged the first role of her career in ‘Basant’ (1942), which turned out to be a hit. In the movie, she played the daughter of Mumtaz Shanti. Following this, she acted in a number of films, as a child artist. Devika Rani, one of the most popular actresses of her time, got impressed with the talent and potential of Madhubala and advised her to change her name, from Mumtaz, to Madhubala. With time, Madhubala gained the reputation of a dependable and professional artist. Her exceptional beauty and lissome figure also ensured that she was looked upon as one of the stars of the future.

Early life
Madhubala was born as Mumtaz Jahan Begum Dehlaviin New Delhi, India on 14 February 1933. She was the fifth child among eleven children of a conservative Muslim couple. Her family was a Nawabi family from Kabul, Afghanistan, and a branch of the royal dynasty of Mohammadzai (also called Barakzay) . Her grandparents were exiled by Afghanistan's army to India.
After Madhubala's father, Ataullah Khan, lost his job at the Imperial Tobacco Company in Peshawar,he relocated his family to Mumbai. Young Mumtaz entered the movie industry at the age of nine.
Early career
Mumtaz’s first movie Basant (1942) was a box-office success. She played in it as the daughter of the popular actress Mumtaz Shanti. She went on to act in several movies as a child artist. Actress Devika Rani was impressed by her performances and potential and advised her to assume the name Madhubala,  meaning "a woman of honey". Madhubala soon garnered reputation as a reliable professional performer. By the time she entered adolescence, she was being groomed for lead roles.
Her first break came when producer Kidar Sharma cast her opposite Raj Kapoor in Neel Kamal (1947).She was fourteen when she was given a lead role. The film was not a commercial success, but her performance was received well.
During the next two years, she blossomed into a captivating beauty. After her lead role in Bombay Talkies production Mahal in 1949, Madhubala attained immense popularity. Though she was only 16 at the time, her subtle and skilful performance, upstaged her seasoned co-star Ashok Kumar. The movie and the song Aayega Aanewala in it heralded the arrival of two new superstars: Madhubala and playback singer Lata Mangeshkar.
Serious illness
Madhubala was found to have a heart problem after she coughed up blood in 1950. She was discovered to have been born with a ventricular septal defect, commonly known as a "hole in the heart". At the time, heart surgery was not widely available.
Madhubala hid her illness from the movie industry for many years, but one incident was widely reported by the media in 1954: She was filming in Madras for S.S. Vassan's Bahut Din Huwe when she vomited blood on the set. Vassan and his wife took care of her until she was well again. She continued to work and established herself as an A-grade star.
Madhubala's family was extremely protective of her because of her health problem. When filming at the studios, she would eat only home-prepared food and drink water only from a specific well in order to minimize risks of infection. But her condition took its toll and she died in 1969 at age 36. For most of the 1950s, Madhubala performed successfully despite her illnesss.

Hollywood Interest
In the early 1950s as Madhubala became one of the most sought-after actresses in India, she also attracted interest from Hollywood. She appeared in many American magazines such as Theatre Arts. In their August 1952 issue, Madhubala was featured in an extensive article with a full page photo. The piece was entitled: The Biggest Star in the World (And She's Not in Beverly Hills).  It presented the actress as a mysterious and ethereal woman of mythical beauty with a legion of fans.
During this period, on a trip to Mumbai and its film studios, the American filmmaker Frank Capra was pampered and hosted by the elite of the Hindi movie industry. However the one star he really wanted to meet was conspicuous by her absence, Madhubala. A meeting to discuss an opening for Madhubala in Hollywood was proposed by Capra. Madhubala's father declined and put an emphatic end to her potential Hollywood film career.

Madhubala the icon
In her short life, Madhubala appeared in over 70 films. In all three biographies and numerous articles published on her, she has been compared with Marilyn Monroe and has a similarly iconic position in Indian film history. Perhaps because she died before being relegated to supporting or character roles, to this day Madhubala remains one of the most enduring and celebrated legends of Indian cinema. Her continuing appeal to film fans was underlined in a 1990 poll conducted by Movie magazine. Madhubala was voted the most popular vintage Hindi actress of all time, garnering 58% of the votes, and out ranking contemporary legendary actresses Meena Kumari, Nargis, and Nutan. More recently in rediff.com's International Women's Day 2007 special (see external links), Madhubala was ranked second in their top ten list of "Bollywood's best actresses. Ever" According to the feature, the actresses that made the final list were ranked on "...acting skills, glamour, box office appeal, versatility and icon status -- and the fact that each of them became a figurehead for Bollywood, ushering in a new wave of cinema..."
In 2004 a digitally colorized version of Mughal-e-Azam was released and, 35 years after her death, the film and Madhubala became a success with cinema audiences all over again.
In the past decade, several biographies and magazine articles have been issued on Madhubala, revealing previously unknown details of her private life and career. Consequently in 2007, a Hindi film Khoya Khoya Chand was produced starring Shiney Ahuja and Soha Ali Khan - the plot included some events loosely based on the life of Madhubala and other vintage film personalities.
In 2008 a commemorative postage stamp featuring Madhubala was issued. The stamp was produced by India Post in a limited edition presentation pack which featured images of the actress. It was launched by veteran actors Nimmi and Manoj Kumar in a glittering ceremony attended by colleagues, friends and surviving members of Madhubala's family. The only other Indian film actress to be honoured in this manner is Nargis Dutt.





 



Saturday, 7 April 2012

ज्ञान की सुनामी से बचो , जिंदगी की पोथी को पढो


आज अपने जीवन में हर व्यक्ति कुछ न कुछ खोज रहा है। कोई सुख खोज रहा है कोई सुविधा खोज रहा है कोई चैन तो कोई सुकून खोज रहा है। जो व्यक्ति पड़े लिखे नहीं हैं वो लोग अपनी खोज को अधुरा छोड़ देते हैं पर जो व्यक्ति पड़े लिखे हैं वो इसके लिए किताबो का सहारा लेते हैं। और कई हद तक हमें उन खोजो के बारे में जानकारी भी मिलाने लगती है फिर हमे और जानकारी के और किताबें पदनी पढ़ती हैं। फिर धीरे धीरे हमें उन किताबो की आदत सी पद जाती है। लेकिन अन्त समय में हमे लगता है हमने इतनी किताबें पड़ी लेकिन फिर भी हमरी खोज की प्यास नहीं बुझी , वो अधूरी रही। क्योंकि पढने से तो सब कुछ मिल नहीं जाता हमे सारी क्रियाएं खुद करनी पड़ती हैं। उदाहरण के लिए अगर हम प्यासे हैं और पानी के बारे में पढने से तो हमारी प्यास नहीं बुझ  जाएगी, हम भूखे हैं तो भोजन के बारे पढने से हमारी भूख मिट नहीं जाएगी ।
                                                                    हमे हर चीज की अभिव्यक्ति देखनी पड़ती है अगर कोई फूल गहरे सागर  में खिलता है। तो उसे अपना व्यक्तित्व दर्शाने के लिए कोई अभिव्यक्ति नही देनी पड़ती। हमारे  जीवन में लोग बिना भाषा के नहीं रह सकते हैं हमे उसके लिए  संचार का प्रयोग करना पड़ता है ।इस संसार में फूल पेड़, पौधे, पक्षी , जानवर सभी वार्तालाप करते हैं लेकिन किसी को भाषा की कोई जरुरत नहीं होती । ये लोग अपना काम चला लेते हैं लेकिन मानव का काम बिना किसी भाषा के नहीं चल सकता है। मानव का अस्तित्व उसकी  भाषा अभिव्यक्ति पर। यही उसकी गरिमा और गौरव है और उसकी मुसीबत है।
अगर मानव दो चार किताबें पढ़ लें और कुछ डिग्रियां ले लें तो यो समझता है की वो ज्ञानी हो गया लेकिन ये उसकी भ्रान्ति होती है। क्योंकि उसने इतना सब कुछ तो पढ़ लिया पर वो अपनी जिंदगी को कभी नहीं समझ पाया है।

इसलिए हमे अपनी जिंदगी को समझना चाहिए और अपने प्राणों व अपनी अंतरात्मा के रहस्य को खोजना चाहिए। हमे किताबो में ही नहीं अटकना चाहिए। अपने जीवन का अभिप्राय अपने जीवन में खोजो। अपने प्राणों को पढो। हमारे प्राण ही हमारी ज्ञान की किताब हैं यही एक जीवन शास्त्र है और इस जीवन शास्त्र को हम जन्म के वक़्त से ही साथ लाये हैं। और हर व्यक्ति को वह  शास्त्र पड़ना चाहिए।
पोथी पढ़ पढ़ मर गए लोग
जीवन भर पड़े और भूल गए लोग
ज्ञान की उपलब्धि हो न सकी
 
ज्ञान तो विचार की उपलब्धि से पनपता है
पड़ोगे, सुनोगे, स्मृति में रखोगे
भरी हो जायेगा स्मृति का बोझ
जान लोगे तुम सब कुछ बिन पहचाने
शब्दों के कारन ज्ञानी न जाओ पहचाने
मन की पोथी को समझो
अपना जीवन शास्त्र समझ अपनाओ



Friday, 6 April 2012

सुहानी सुबह



सुबह का कल कल शुरू हो चुका है 
चिड़िया चहक चहक कर गान कर रही है 
मोर की पिन्हू पिन्हू सबको आकर्षित कर रही है 
कबूतर ये  गुटरगू  गुटरगू करके ये किसको बुला रहा है 
कोयल की कूह ये किसको रिझा रही है 
ठंडी ठंडी पवन मन को शीतलता पंहुचा रही है 

नया जोश नई उमंगें लेकर ये भोर हमे जगा रही है 
जागो नींद से, सोने वाले, फिर से ये सुहानी सुबह तुमको जगा रही है 
सूरज चाचू भी आकाश से झांक रहे है 
उनकी किरणों के लिए सब इधर उधर भाग रहे हैं  

मंदिर में घंटे की आवाज मंदिर बुला रही है 
आँखों में सपने दिल में उम्मीदें सजा रही है 
माँ के हाथो से जले दीपक की लौ नैनों की रोशनी बढ़ा रही है 
हर सवेरा लोगो के चेहरों पे नयी चमक ला रहा है 

भंवरा घर घर फूल  खिला रहा है 
फूलों की सुगंध से घर का आँगन महका रहा है 
तितलियाँ उड़ उड़ कर फूलों का मन बहला रही हैं 
और इसी तरह हर सुबह मन को खिला रही है 

स्वरचित(neha singh(8-4-12))   

Sunday, 1 April 2012

save enviornment for sustaible development

पर्यावरण मानव को ईश्वर के द्वारा दिया गया अमूल्य उपहार है यह सारे  समाज का या  कहे की  सारे विश्व का एक प्रमुख अंग है । पर्यावरण और ईश्वर प्रकृति वो दो पहलू  हैं जिनकी पूजा  और महत्ता के बिना जीवन अधूरा है। विज्ञान के इस युग में मानव को जहां कुछ वरदान मिले है, वहां कुछ अभिशाप भी मिले हैं। प्रदूषण एक ऐसा अभिशाप हैं जो विज्ञान की कोख में से जन्मा हैं और जिसे सहने के लिए अधिकांश जनता मजबूर हैं।प्रदूषण का अर्थ है -प्राकृतिक संतुलन में दोष पैदा होना! न शुद्ध वायु मिलना, न शुद्ध जल मिलना, न शुद्ध खाद्य मिलना, न शांत वातावरण मिलना !
पर्यावरण का निर्माण प्रकृति द्वारा प्रदान पांच तत्वों से मिलकर हुआ है वो तत्व  पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश हैं। मनुष्य अपनी मूलभूत  आवश्यकताओ के लिए जल, मिटटी, पेड़, पौधे, जीव जंतुओं पर निर्भर है।  मनुष्य अपने जीवन चक्र के लिए इन सभी का दोहन करता आ रहा है और आगे भी मानव को इन सभी की आवश्यकता होगी जितनी  कि अभी है, पर शायद आज सभी ये  भूल चुके हैं।

                                                             ये बात कंही हद तक  काफी सही है कि देश और समाज के विकास के लिए हमको आधौगीकरण  और  मशीनीकरण  कि जरुरत है। वर्तमान समय में जहाँ हम एक तरफ  हर काम सुगम बना रहे है वही हम दूसरी तरफ पर्यावरण के नियमो का उल्लंघन कर रहे हैं। मानव  स्वार्थपूर्ति के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन करने लगा है और पर्यावरण को असंतुलित बनाए हुए हैं ।जिसके साथ पर्यावरण ही नहीं मानव के लिए भी मुश्किलें उत्पन्न हो रही हैं।  
                                                                            औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण के युग में प्रकृति पर अत्याचार होने लगा है, परिणामस्वरूप पर्यावरण में प्रदूषण, अशुद्ध वायु, जल की कमी, बीमारियों की भरमार दिन-प्रतिदिन एक गंभीर चर्चा का विषय बनी हुई हैं, जिससे न तो मनुष्य प्रकृति को बचा पा रहा हैं और न ही खुद को । आज जहाँ मानव समाज विलासितापूर्ण जीवन की चाह लिए हुए प्रकृति का अति दोहन करता जा रहा हैं, वहीं वह अज्ञानतावश स्वयं की जान का भी दुश्मन बन चुका हैं।प्रदूषण कई प्रकार का होता है! प्रमुख प्रदूषण हैं - वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण और ध्वनि-प्रदूषण ! मानव यह नहीं जनता है की उसके विकास में और सारे  संसार के विकास मे पर्यावरण अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है क्योंकि अगर हम अपनी धरती माता को अपनी वसुंधरा को सुन्दर बनाना है । तो हमे पर्यावरण को बचाना अति आवश्यक है .....


माता का रूप धरती

हो सुन्दरतम अपनी ये धरा..
हो हरी भरी यह वसुन्धरा...
माता का रूप है ये धरती
हर पल पालन करती..."

है हित सभी का हित इसमें
हो संतुलित, अपना पर्यावरण
सुरक्षित हो जंतु नभ तल

पेड़ो को क्यों काटकर
काट रहे खुद के पैर
स्वम मिटा रहे सौन्दर्य तुम
वसुधा के अंगो का न करो सर्वनाश तुम

क्यों रण भूमि मे तब्दील कर रहे जन्मदाती है ये हमारी
नदियों की साँसे हैं रुकी रुकी सी
सागर भी हैं खड़े रुके रुके से
प्रकृति को होना पड़ रहा है मौन
पेड़ो के शव जो हैं धरती पर पड़े हुए
बनकर तुम दुशासन अनुयायी
क्यूँ करते धरती का चिर हरण

पीं -पीं,  कु- कु,  धम- धम ,
यही ध्वनी सुनाई है देती
जन्हा कंही भी नजर है जाती
उगती कंक्रीट की खेती
शेर, बया, जिराफ, दादुर,
देने को बस रहे उदाहरण

तारो की चमक हो रही धुंधली
कारखानों के धुएं से वायु हो रही धूमिल
ओजोन भी हुआ अब तो घायल
उसमे हो रहे छोटे बड़े छेद
आग उगलता है धरती का सीना
हिम पिघल बह रहा स्वेद

कितने सारे  बेल फूल हो गए दाह
तिल तिल कर मरने से अच्छा एक बार में हो दाह
लुप्त हो गयी कई वनस्पति की जाति
बैबून , तुम्बी, और घाट परण
हो जागरूक अब करे सभी प्रयत्न
बचाना है धरती माता को हो सबका यही प्रण
है सभी  का हित इसमे
हो संतुलित अपना पर्यावरण
सुरक्षित हो जीव जंतु नभ तल


   
    पर्यावरण संरक्षण में वृक्षो का महत्व 

पर्यावरण संरक्षण में वृक्षो का महत्व बहुत ही ज्यादा है। जिस तरह आज औधोगीकरण के युग में वृक्षो की अंधाधुन्द कटाई हो रही है। आज समाज सेवी संस्थाओं द्वारा जनता को प्रोत्साहित किया जा रहा है।कि वह पेड़ लगाये , लेकिन आज वृक्ष रोपण को अनिवार्य बना देना चाहिए । तभी देश का विकास  और पर्यावरण का  संरक्षण संभव है । वृक्ष हमारे प्राण है क्योंकि वो हमे प्राण वायु देते हैं । सघन वनों को तो हमारी धरती के फेफड़े कहा जाता है ।वन  ही वायु के शोधक होते हैं वनों से ही हमे जीवन मिलता है। फिर क्यों हम इन मूक परमार्थी  को काटने में लगे हुए है और इनके काटे जाने का विरोध भी नहीं करते हैं ।आखिर कब तक अपने विनाश का कारण हम खुद ही बनते रहेंगे । वनों की अंधाधुन्द कटाई से जंगली जानवरों का निवास नष्ट हो रहा है ,वन प्रतिपालित जीवो का मरण हो रहा है । इसी वजह से आये दिन जंगली जानवर रिहायशी इलाको में आते रहते हैं और नुकसान पंहुचाते हैं । बस्तियों व छोटे शेहरो से पेड़ गायब हो रहे है वंहा पेड़ की छाया में खड़े होने का सुख शायद ही कोई व्यक्ति ले पता हो । कहा जाता है की जंगल में मंगल होता है जंगल ही जलवायु के रक्षक होते हैं फिर क्यों लोग इसको नष्ट करने में लगे है । ऐसे कैसे हो सकता है विकास ?

           वृक्ष का दर्द 
वृक्ष का दर्द किसने है जाना 
अकेले वृक्ष को किसने है अपना माना

दर्द किसी का कोई नहीं जान पाया 
एक वृक्ष के अंतर मन में कोई नहीं झाँक पाया 

दो गज जमीं में अपना जन्हा है इसने पाया 
कितनी विशाल है ये धरती कोई वृक्ष कंहा  है ये जान पाया 
               
 काश अपने सिमित स्थान को ये विस्तृत कर पता 
इंसान की तरह वृक्ष भी चल पाता

लेकिन मन के पाँव से ना शरीर चलता 
ना ही मन के हाथो से ये अपनी रक्षा कर पाता 

इससे रोज जोड़ते नए रिश्ते पर कोई नहीं निभाता 
इस निरंतर दौड़ती दुनिया में ये हमारे साथ नहीं चल पाता 

सूरज के निकालने से सूरज के ढलने तक 
जीवन के बनने से जीवन के मिटने तक
यही जमीं है, तुम्हारा संसार तुम्हारे कटने तक   
  

    
                                                  जल ही जीवन है
                                                      
कहते हैं " जल ही जीवन है " और " बिन पानी सब सून " यानी जल के बिना हम जीवन की कल्पना ही नही कर सकते और बिना पानी के इस धरती पर कोई रहना ही नही चाहेगा तथा बिना पानी के धरती की सारी हरियाली बिल्कुल ख़त्म हो जायेगी पानी के बिना साफ - सफाई नही हो पायेगी  और सारी पृथ्वी का पर्यावण प्रदुषित हो जाएगा तथा पृथ्वी रहने
लायक नही रहेगी इस कारणवश पृथ्वी मानव विहीन हो जाएगी
एक कहावत है "घर की मुर्गी दाल बराबर "यानी हम पानी के सन्दर्भ में यह कह सकते है की हम पानी की तलाश में सौर मंडल के कई सारे ग्रहों पर खाक छान रहे है मगर अपनी धरती पर मौजूद पानी की कद्र ही नहीं कर रहे है I पानी एक रासायनिक पदार्थ है वैसे तो ये अपनी सामान्य अवस्था में ही प्रयोग किया जाता है पर कभी कभी हम इसको बर्फ, भाप, आदि के रूप में भी प्रयोग करते हैं ।वृक्ष की तरह जल भी हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है । मनुष्य जल क बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता है। मैं कहना चाहूंगी उन लोगो से जो पानी को बर्बाद करते हैं की क्या उन्होंने पानी के बिना जीने की कोई कला सिख ली है अगर हाँ तो वो आने वाली पड़ी को भी वो कला सिखा दे । क्योंकि जिस तरह से आज पानी की बर्बादी हो रही है । भविष्य में लगता है पानी बचे ही ना। 
                   हम अगर   इस मुसीबत से उबरना  हैं........तो पानी की बचत करे और संरक्षित करे



आज भारत ही नही वरन संपूर्ण विश्व मे सबसे बड़ी समस्या है गिरते भू जल स्तर की । आज सभी पानी की समस्या को लेकर गंभीर रूप से चिंतित है। बर्तमान स्थिति को देखते हुए भविष्य मे पानी की पर्याप्त प्रचुरता हो और अगली पीढ़ी को पानी पीने को मिले हमे यही प्रयत्न करना चाहिए । आज हम सजग ना हुए तो अगली पीढ़ी हमे माफ़ ना करेगी। भू जल क म है । बढ़ते  शहरीकरण के कारण गहरे बोरिंग करने के कारण पानी की सतह बहुत नीचे पहुच गयी है उसका पोषण करना बहुत ज़रूरी हो गया है|
                   कुछ  सादा तकनीको को अपनाकर हम जल को संरक्षित कर सकते है. यह वाटर हावेस्टिंग सिस्टम ही आगामी पीडी को प्यासा मरने से बचा सकती है. अपने घर की छत का पानी  एकत्रित कर अपने बोर वेल को चार्ज कर सकते है इसके कारण आपके घर के आसपास का जल स्तर बढ़ जायेगा। यह उपाय इतना महत्वपूर्ण है की एक घंटे की बारिश आपको एक साल का पानी उपलब्ध करा सकती है।  यदि 1000 फीट की छत है और एक सेंटी मीटर बारिश होती है तो लगभग 1000 लीटर पानी एकत्रित होता है और यदि एक साल मे यदि 40 इंच बारिश होती है तो एक लाख लीटर पानी भू तल मे जायेगा ।इससे  भू जल की गुणबत्ता भी बढ़ेगी और यह  मिनरल वाटर से भी अधिक शुद्ध होता है ।
याद रखे पानी की एक एक बूँद क़ीमती है जल ही जीवन है .कृपया जल को सरक्षित करने का संकल्प ले।आप सोच रहें होंगे की मैंने यह सब कितनी  आसानी  से कह दिया जबकि कहने और करने में फर्क  होता है मगर कहते है ना
 "हिम्मत  - ऐ -मर्दा  तो  मदद - ऐ - खुदा " यानि जो हिम्मत  दिखाता है उसकी मदद खुदा भी करता है ।

अब बात करते है हैं धरती माता की जी हाँ  हमारी धरती माता अब कुछ ज्यादा ही गरम हो चुकी हैं  साफ़ साफ़ कहें तो ग्लोबल वार्मिंग ।ग्लोबल वार्मिंग या वैश्विक तापमान बढ़ने का मतलब है कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है. वैज्ञानिको का कहना है कि आने वाले दिनों में सूखा बढ़ेगा, बाढ़ की घटनाएँ बढ़ेंगी और मौसम का मिज़ाज बुरी तरह बिगड़ा हुआ दिखेगा।
इसका असर दिखने भी लगा है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं और रेगिस्तान पसरते जा रहे हैं. कहीं असामान्य बारिश हो रही है तो कहीं असमय ओले पड़ रहे हैं. कहीं सूखा है तो कहीं नमी कम नहीं हो रही है।इस परिवर्तन के पीछे ग्रीन हाउस गैसों की मुख्य भूमिका है. जिन्हें सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं. इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड है, मीथेन है, नाइट्रस ऑक्साइड है और वाष्प है.। ये गैसें वातावरण में बढ़ती जा रही हैं और इससे ओज़ोन परत की छेद का दायरा बढ़ता ही जा रहा है.। ओज़ोन की परत ही सूरज और पृथ्वी के बीच एक कवच की तरह है। आगरा वो कवच ही नहीं रहेगा तो हम क्या करेंगे ?
इसका  कारण हैं..................
                                               तेज़ी से हुआ औद्योगीकरण है, जंगलों का तेज़ी से कम होना है, पेट्रोलियम पदार्थों के धुँए से होने वाला प्रदूषण है और फ़्रिज, एयरकंडीशनर आदि का बढ़ता प्रयोग भी है।
क्या आपने सोचा है क्या होगा इसका असर?
इस समय दुनिया का औसत तापमान 15 डिग्री सेंटीग्रेड है और वर्ष 2100 तक इसमें डेढ़ से छह डिग्री तक की वृद्धि हो सकती है.।एक चेतावनी यह भी है कि यदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तत्काल बहुत कम कर दिया जाए तो भी तापमान में बढ़ोत्तरी तत्काल रुकने की संभावना नहीं है.।पर्यावरण और पानी की बड़ी इकाइयों को इस परिवर्तन के हिसाब से बदलने में भी सैकड़ों साल लग जाएँगे.।
ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिएहमे सीएफसी गैसों का ऊत्सर्जन कम रोकना होगा और इसके लिए फ्रिज़, एयर कंडीशनर और दूसरे कूलिंग मशीनों का इस्तेमाल कम करना होगा या ऐसी मशीनों का उपयोग करना होगा जिनसे सीएफसी गैसें कम निकलती हैं।क्योंकि आज मानव अपना घर तो ठंडा कर लेता है लेकिन वो वातावरण को इतना गरम कर देता है जिसका परिणाम है ग्लोबल वार्मिंग । औद्योगिक इकाइयों की चिमनियों से निकले वाला धुँआ हानिकारक हैं, और इनसे निकलने वाला कार्बन डाई ऑक्साइड गर्मी बढ़ाता है. इन इकाइयों में प्रदूषण रोकने के उपाय करने होंगे।
वाहनों में से निकलने वाले धुँए का प्रभाव कम करने के लिए पर्यावरण मानकों का सख़्ती से पालन करना होगा।
                    उद्योगों और ख़ासकर रासायनिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे को फिर से उपयोग में लाने लायक बनाने की कोशिश करनी होगी.।और प्राथमिकता के आधार पर पेड़ों की कटाई रोकनी होगी और जंगलों के संरक्षण पर बल देना होगा.।
अक्षय ऊर्जा के उपायों पर ध्यान देना होगा यानी अगर कोयले से बनने वाली बिजली के बदले पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और पनबिजली पर ध्यान दिया जाए तो आबोहवा को गर्म करने वाली गैसों पर 
नियंत्रण पाया जा सकता है।.
                                                ध्वनि प्रदूषण के अंतर्गत आता है विभिन्न वाहनों से पैदा होने वाला शोर, आतिशबाजी का शोर, चुनाव प्रचारों और धार्मिक प्रचारों का शोर, दशहरा होली के दिन बजने वाला कान फाडू संगीत या आज कल शादी ब्याह में चला डी.जे. का नया शौक ।

                                                                                                                                  ध्वनि प्रदूषण की वजह से हृदय की धड़न बढ़ना (हांलाकि दिल की धड़कन सुंदर लड़कियों के सामने आ जाने पर भी बढती है), रक्त संचार मे कमी, चिड़चिड़ापन, अत्यधिक मानसिक तनाव व स्थाई बहरापन आदि दिक्कते होती हैं ।हर इन्सान को म्यूजिक सुनने का हक़ है पर अगर वो उस संगीत को सिर्फ अपने तक सिमित रखे तो ध्वनि


याद रहे कि जो कुछ हो रहा है या हो चुका है उसके लिए मानवीय गतिविधियाँ ही दोषी हैं।.और इसका परिणाम मानव को ही भुगतना होगा। इसका एक उदाहरण हमारे देश के दिग्गज २०१२ फिल्म के रूप में दे चुके हैं। 

                                                मृदा प्रदूषण को भी मत भूलियेगा क्योंकि ये भी एक प्रकार का प्रदूषण होता है । आज हम लोग अपना हर कचड़ा जमीं पर डाल देते हैं पर क्या हमने सोचा है की हम जो कुछ भी उपयोग करते हैं। वो सब कुछ हमे जमीं से ही मिलाता है । भोजन से लेकर पहनने तक कहें तो सुबह से लेकर रात तक फिर हम मृदा प्रदुषण को अनदेखा नहीं कर सकते हैं ।

                                                                                                                                       अब जानिए की सब से बड़ा और सभी प्रदूषणों की जड़ कौन है आप सोच रहे होंगे अब ये कौन सा नया प्रदुषण आ गया वो है .............,

                                       जो सबसे बड़ा प्रदूषण है उस पर किसी की निगाह अभी तक नहीं गई है । जब निगाह ही नहीं गई है तो उसको प्रदूषण भी नहीं मानेंगे । फिर उस प्रदूषण को हटाना, खत्म करना किसी के बस की बात भी नहीं है । इस सबसे बड़े प्रदूषण को तो वही हटा सकता है जिसने इस प्रदूषण को फैलाया है । आप लोग सोच रहे होगे कि ये सबसे बड़ा प्रदूषण क्या बला है जिस पर अब तक हमारी नजर ही नहीं पड़ी ।  वह सबसे ज्यादा प्रदूषित है,  सभी प्रदूषणों का बाप, और सारे प्रदूषण जिसकी उंगली पकड़ कर चलना सीखते हैं।  वह है इंसान, मानव, ह्ययूमन बींग, सबसे विवेकशील प्राणी, सभी प्रकार के प्रदूषणों की जड़ यानि की हम । हम से मतलब हम सभी, इस पृथ्वी नामक ग्रह पर निवास करने वाले साढ़े छ: अरब इंसान । प्रकृति के बनाये हुये सबसे विवेकशील प्राणी, जिसने अपने विवके से दूसरे जीव जंतुओं का तो जीना हराम कर ही दिया है और प्रकृति की भी नाक में भी दम कर रखा है । कहाँ कहाँ नहीं हम ने गंदगी फैलाई है । चाहे वह माउंट ऐवरेस्ट हो या फिर प्रशांत महासागर । चांद पर भी हो आये हैं तो जाहिर है वहाँ भी कुछ न कुछ गंदगी फैलाई होगी । अगर गंदगी नहीं फैलायेंगे तो फिर इंसान कैसे । जिसको कहते हैं पर्यावरण उसका हमने सत्यानाश बल भर किया है । चारों तरफ एक महान प्रदूषण फैला हुआ है (यानि कि इंसान) और इसके द्वारा फैलायी हुयी गंदगी । धरती माता अपने इस लाल की करतूत देख कर सोचती होंगी कि तेरी वजह से आज न जाने कितने जीव-जन्तु, पक्षी और वनस्पतियाँ या तो खत्म हो चुके हैं या फिर लुप्त होने के कगार पर हैं । तू इस कोख से जन्म न लेता तो ही ठीक था । ये दुनिया तेरे बिना ज्यादा सुंदर और शांत होती ।

                                            तो  कुल मिलाकर सारे प्रदूषणों की जड़ है इंसान । जाहिर है हम अपनी परेशानी खुद है । बढ़ती हुयी जनसंख्या, न सिर्फ पर्यावरण को प्रदूषित करती है बल्कि बेरोजगारी और अपराध को भी बढ़ावा देती है । देश की अर्थव्यवस्था और कानून व्यवस्था की ऐसी तैसी होती है सो अलग । आज हमारा देश विकासशील देश है तो इसके जिम्मेदार हम हैं क्योंकि हम आज भी अपनी आबादी पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं। जाहिर है ज्यादा आबादी यानि कि ज्यादा प्रदूषण । ज्यादा दिक्कतें ।

                                 तो कैसे हो सकता है विकास इस संसार का तो इसके लिए हमे पर्यावरण को तो हर हालत में बचाना ही होगा ।अब सोच क्या रहे है लग जाइये अपने काम पर अगर आप जीना चाहते हैं तो अगर आपने जीने की उम्मीद छोड़ दी है तो कोई बात नहीं पर ये ध्यान रखिये की पर्यावरण विकास के  बिना इस सृष्टि का विकास मुमकिन ही नहीं नामुमकिन है ।

  जन जन से है यही कहना वृक्ष धरा का है गहना,

शुद्ध ना हो अगर वातावरण, मानवता का होगा मरण,

कटते वृक्ष उजड़ते वन से दे रहे प्रलय को आमंत्रण 

पेड़ लगाओ , जल बचाओ, इस धरा को प्रदुषण मुक्त बनाओ,

पर्यावरण बचाओ इस धरा को स्वर्ग बनाओ।

 

(स्वरचित neha singh(2-april-2012))